Wednesday, July 27, 2016

गांधीजी की हत्या और राष्ट्रीय स्वयं सेवक-प्रवीण गुगनानी

गांधीजी की हत्या और राष्ट्रीय स्वयं सेवक विषय पर पर्याप्त से अधिक बहस इस देश में हो चुकी है. संघ की इस घृणित कार्य में कण मात्र भी संलिप्तता न होनें पर पर भी पर्याप्त से अधिक प्रकाश स्थापित जननायकों द्वारा, आयोगों, कमिशनों व स्वयं न्यायालयों द्वारा डाला जा चुका है. गांधी जी की हत्या के पश्चात के प्रत्येक दशक में दो चार बार गोएबल्स थियरी के ठेकेदारों ने ये प्रयास सतत किये हैं कि गांधीजी की हत्या को संघ के मत्थे मढ़ दिया जाए जिसमें वे हर बार असफल रहें हैं. अब हाल ही में ऐसा उल्लेखनीय किंतु कुत्सित प्रयास राजकुमार राहुल गांधी ने भी किया था. राहुल गांधी ने थाणे जिले के सोनाले में आयोजित चुनावी सभा में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को गांधीजी का हत्यारा बताया था. हाल ही में राहुल गांधी के इस कथन के विरुद्ध चल रहे मानहानि के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने राहुल गांधी को चेतावनी देते हुए कहा है कि राहुल गांधी इस मामले में क्षमा माँगें या फिर मुकदमे का सामना करें. उच्चतम न्यायालय ने राहुल गांधी के भाषण पर सवाल उठाए और आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि 'उन्होंने गलत ऐतिहासिक तथ्य का उल्लेख करते हुए भाषण क्यों दिया? राहुल गांधी को इस तरह एक संगठन की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं करनी चाहिए थी।' संघ के साथ कांग्रेस का विद्वेष, विरोध, झूठ भरा रवैया सदैव से ही रहा है. कांग्रेस का यह रवैया ही राहुल के कथन में भी उभरा किन्तु अब लगता है कि उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय के बाद अब राहुल गांधी माफ़ी मांगे या मुक़दमे का सामना करें दोनों ही परिस्थितियों में "संघ और गांधी हत्या" इस घनघोर मिथक पर निर्णायक राष्ट्रीय वातावरण बनानें में मदद तो मिलेगी ही. राहुल गांधी भली भांति समझते हैं कि गांधीजी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी और इसके लिए ठोस एवं पर्याप्त राजनैतिक, एतिहासिक, न्यायालीन तथ्य सर्वसुलभ हैं, फिर भी राहुल गांधी संभवत: अब भी यह नहीं समझ पाए हैं कि गांधीजी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी, संघ ने नहीं. अब राहुल गांधी को और उनके साथ इस मिथक पर चर्चा करनें वाले सभी लोगों को इसके लिए न्यायालय के दिए निर्णय को अपनी मानसिकता का आधार बनाना होगा. न्यायालय ने कहा है कि गोडसे ने गांधी को मारा और संघ या संघ के लोगों ने गांधी को मारा, इन दोनों कथनों में बहुत बड़ा अंतर है. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि नाथूराम गोड़से संघ की विचारधारा के साथ संतुलन नहीं बैठा सका. गोड़से संघ को कट्टर हिन्दूवादी संगठन समझकर उससे जुड़ा था, किन्तु बाद के वर्षों में संघ के विषय में गोड़से की सोच बदलनें लगी और तब गोड़से न केवल संघ से अलग हुआ बल्कि एक हद तक संघ का मुखर विरोधी भी बना. हिंदूवादी विषयों में नाथूराम गोड़से अतिवादी था जबकि संघ व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण रखकर हिंदूवादी विषयों को धेर्यता पूर्वक आगे बढ़ाने में विश्वास रखता था. यही कारण था कि गोड़से के समाचार पत्र 'हिन्दू राष्ट्र' में संघ विरोधी आलेख प्रकाशित होते रहते थे. गोडसे ने संघ की आलोचना करते हुए सावरकर को पत्र भी लिखा था जिसमें उसनें संघ को हिन्दू युवाओं की शक्ति को बर्बाद करनें वाला संगठन बताया था. एतिहासिक तथ्यों से स्थापित सत्य है कि प्रारंभ में संघ से प्रभावित रहा गोड़से बाद के वर्षों में संघ का घोर और मुखर विरोधी बन गया था. गांधी जी की हत्या के समय केन्द्रीय गृह सचिव रहे आर.एन. बनर्जी भी गोड़से के संदर्भ में यही राय रखते थे. गांधीजी की हत्या के लिए गठित कपूर आयोग के समक्ष दी गई गवाही में आर. एन. बनर्जी ने कई सारे तथ्यों के साथ इस बात को सशक्त रूप से व्यक्त किया था. बनर्जी ने यह भी कहा था कि गांधी जी के हत्यारे संघ की गतिविधियों से असंतुष्ट रहनें वाले लोग थे. आरएसएस प्रारंभ से ही खेलकूद, शारीरिक व्यायाम के पुट के साथ राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाता रहा है जबकि नाथूराम गोड़से इसे व्यर्थ बताता था और वह अधिक उग्र और हिंसक गतिविधियों में विश्वास रखता था. (कपूर आयोग रिपोर्ट खंड 1 पृष्ठ 164)
             यह अवश्य सत्य है कि नाथूराम गोड़से और उसके साथियों ने त्वरित आवेश व क्रोध में नहीं अपितु जान-बूझकर, षड्यंत्रपूर्वक और चित्तलीन होकर गांधीजी की हत्या की थी. गांधी जी की हत्या के प्रकरण में न्यायालय में दोषियों ने इसका व्यवस्थित जवाब भी दिया है जो कि एक अलग और व्यापक विमर्श का विषय है. महत्वपूर्ण तथ्य यही लगता है कि गांधी जी की हत्या के दोषियों के मन में इस बात का तात्कालिक क्रोध था कि मुसलमानों ने भारत का विभाजन करवाया, फिर भी मुसलमानों, उनके संगठन मुस्लिम लीग तथा पाकिस्तान के प्रति गांधीजी ने अतीव व अतर्कसंगत रूप से नरम रुख अपनाया था. गांधी जी के हत्यारे, गांधी जी के उस कार्य को राष्ट्रद्रोह मानते थे जिसमें गांधीजी ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रु. का मुआवजा देनें की जिद की थी और नहीं देनें पर अनशन करनें की धमकी तक दे दी थी. उस समय के राजनैतिक हालातों में जिसमें पाकिस्तान हिन्दुओं की लाशों से भारी रेलगाड़ियां भारत भेज चुका था, पाक में रहनें वाले हिन्दुओं पर सतत दुर्दांत अत्याचार हो रहे थे, पाकिस्तान कश्मीर पर हमला कर रहा था तब पाकिस्तान को 55 करोड़ देनें की गांधीजी की जिद और न देनें पर अनशन की धमकी ये सब कुछ हत्यारों की उत्तेजना का कारण बना था. एक सुविचारित षड्यंत्र, विद्वेष व राजनैतिक विरोध के चलते आरएसएस का नाम गांधी जी की हत्या के मामले में समय समय पर लिया जानें लगा. यद्दपि देश की जनता ने इस झूठ पर कभी भी विश्वास नहीं किया व संघ के हिन्दू राष्ट्रवाद को इसीलिए समय से साथ भारतीय जनता का प्रतिसाद सतत निरंतर बढ़ता गया. गांधी जी की हत्या के पश्चात जो प्राथमिकी fir तुगलक रोड थाने में दर्ज कराई गई वह भी संघ के इस कांड से कोई सम्बंध न होने को प्रमाणित करती है.  यद्दपि इस एफआईआरक्र. 68, 30.01. 48 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का कहीं कोई जिक्र नहीं है तथापि प्रधानमंत्री नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी व अब राहुल गांधी तक परंपरागत रूप से गांधी हत्या में आर एसएस का नाम लेते रहे हैं. इंदिरा गांधी ने भी वर्ष 1965 में गांधी जी की हत्या में संघ की भूमिका साफ़ होती देखकर पुनः षड्यंत्र पूर्वक जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया. इस आयोग के गठन के पीछे संघ के प्रति दुर्भावना ही काम कर रही थी. कपूर आयोग ने 101 साक्ष्यों के की हत्या को लेकर विद्वेषपूर्वक घेरते रही. संघ के लोगों को इन कांग्रेसी और वामपंथी नेताओं द्वारा समय समय पर अनर्गल भाषणों से सामाजिक प्रताड़ना भी सतत दी जाती रही.  गांधी जी की हत्या के तुरंत बाद देश भर में संघ के लोगों पर छापे पड़े, गिरफ्तारियां भी हुई. तत्कालीन गृह मंत्री वल्लभभाई पटेल इन संघ के संदर्भ में निरंतर चैतन्य बने रहे और संघ के लोगो पर पड़ने वाले छापो गिरफ्तारियों और उसके परिणामों व संघ के लोगों की गांधीजी की हत्या में संलिप्तता का गहन अध्ययन करते रहे. व्यापक छानबीन व जांच के बाद वल्लभभाई पटेल को यह
तथ्य तरह से स्पष्ट होने लगा कि गांधीजी की हत्या में संघ की कोई भूमिका नहीं है. का संघ से कोई वास्ता नहीं है. सरदार पटेल के इस निर्णय पर पहुचने व इस संघ के नितांत असंलिप्त रहने के तथ्य को मंचो से बोलने से नेहरू वल्लभ भाई से नाराज हुए और उनको इस संदर्भ में एक पत्र भी लिखा. नेहरू ने अपने पत्र में आरोप भी लगाया कि दिल्ली पुलिस और उसके अधिकारी संघ से सहानुभूति का भाव रखते हैं अतः संघ के लोग गिरफ्तार नहीं हो पा रहे हैं. जवाहर लाल नेहरू के इस पत्र के उत्तर में सरदार पटेल ने 27.02.48 को प्रधानमंत्री नेहरू को जो पत्र लिखा वह अत्यंत महत्वपूर्ण है. पत्र में पटेल ने नेहरू को लिखा कि गांधीजी की हत्या के सम्बन्ध में चल रही कार्यवाही से मैं पूरी तरह अवगत रहता हूं. सभी अभियुक्त पकड़े गए हैं तथा बयान हो गए हैं. उनके बयानों से स्पष्ट है कि यह षड्यंत्र दिल्ली में नहीं रचा गया. दिल्ली का कोई भी व्यक्ति षड्यंत्र में शामिल नहीं है.  षड्यंत्र के केन्द्र बम्बई, पूना, अहमदनगर तथा ग्वालियर रहे हैं. यह बात भी असंदिग्ध रूप से उभरकर सामने आई है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ इससे कतई सम्बद्ध नहीं है. यह षड्यंत्र हिन्दू सभा के एक कट्टरपंथी समूह ने रचा था. यह भी स्पष्ट हो गया है कि मात्र 10 लोगों द्वारा रचा गया यह षड्यंत्र था और उन्होंने ही इसे पूरा किया. इनमें से दो को छोड़ सब पकड़े जा चुके हैं. इस महत्वपूर्ण पत्राचार से स्पष्ट होता है कि सब कुछ स्पष्ट होने के बाद भी कांग्रेसी और कुछ पिछलग्गू वामपंथी किस प्रकार दुर्भावना से ग्रस्त होकर संघ को गांधी हत्या के मामले में अनावश्यक घसीटते रहे हैं.
             अब हाल ही के घटनाक्रम में जबकि राहुल गांधी को सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से क्षमा मांगने या मुकदमें का सामना करने का आदेश दिया है तब उन्हें कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सीताराम केसरी का स्मरण अवश्य करना चाहिए क्योंकि वे भी संघ पर अनर्गल आरोप लगाने व क्षमा मांगने का उपक्रम कर चुके हैं!!

Tuesday, March 24, 2015

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ -व्यक्ति निर्माण का महायज्ञ -- श्री विजय नड्ढा जी

शायद बहुत ही कम देश्वासिओं को पता होगा  कि मई, जून की भयंकर गर्मीं में जब लोग अपने परिवार के साथ मनाली, मंसूरी या कश्मीर जैसे ठंडे स्थानों में आनन्द मनाने जाते हैं वहीँ हर साल लगभग 20,000 युवा व् प्रौढ़ कठोर साधना के लिए स्वयं को समर्पित करते हैं। संघ की कार्य पद्धति का ही परिणाम है कि बिना किसी शोर-शराबे के यह साधना गत आठ दशकों से निरंतर चलती आ रही है। यहाँ रोचक और बहुतों को हैरान करने वाली बात होगी कि इन वर्गों में भोजन, वर्दी तथा वर्ग स्थान तक आने जाने का खर्चा स्वयंसेवक स्वयं वहन करते हैं। विश्व की सबसे बड़ी स्वयंसेवी संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी पूरी शक्ति देशभक्त, चरित्र एवं अनुशाशन से युक्त नागरिक निर्माण करने में लगाती है। अपनी स्थापना के तुरंत बाद संघ बिना किसी प्रचार के साधारण सी दिखने वाली शाखा के द्वारा अपनी साधना में जुट गया। इसी अद्भुत कार्य शैली के बल पर आज संघ भारत में एक शक्ति बन चुका है। संघ देश प्रेमिओं के लिए आशा और विश्वास वहीँ देश विरोधी शक्तिओं को अपनी राह में रोड़ा दिखता है। इसी कारण संघ का भारी विरोध भी होता है। संघ की कठोर प्रक्रिया से निकले लाखों स्वयंसेवक देश सेवा में अपना योगदान डाल रहे हैं। यहाँ यह जानने योग्य है की ज्ञात स्वयमसेवकों से अज्ञात स्वयंसेवक कई  गुणा अधिक हैं जो मूक साधन में लगे हुए हैं। स्वयंसेवक के जीवन का सूत्र ही है-

तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित।

चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं।। संघ की मौन लेकिन निरंतर साधना के कारण ही आज देश की बागडोर स्वयंसेवकों के हाथ में है। देश वासिओं को स्वयंसेवकों से बहुत आशा है। देश स्वयंसेवकों पर आँख बंद कर विश्वास भी करता है। रोचक बात ये है की राजनैतिक कारणों से संघ का विरोध करने वाले अनेक लोग व्यक्तिगत रूप में संघ के प्रशंशक हैं। और अपने मन की यह बात वे सार्बजनिक तौर पर व्यक्त करते भी रहते हैं। इस वर्ष के प्रशिक्षण वर्ग भी प्रारम्भ हो चुके हैं। वर्गों का प्रकार - सात दिन का प्राथमिक शिक्षा वर्ग इसके बाद 20-20 दिन के प्रथम और द्वितीय वर्ष और ऑपचारिक प्रशिक्षण का अंतिम पड़ाव 30 दिन का तृतीय वर्ष। यहाँ उलेखनीय है कि जहाँ प्राथमिक वर्ग अपने जिला प्रथम व् द्वितय वर्ष अपने राज्य में होता है वहीँ  तृतीय वर्ष केवल नागपुर में ही होता है। इन्ही वर्गों से प्रेरणा प्राप्त कर हर साल लगभग 400 युवा अपना पूरा समय संघ के माध्यम से राष्ट्र सेवा को समर्पित करते हैं। ये प्रचारक संघ संगठन की बहुत बड़ी ताकत मानी जाती है। आईए! देशभक्ति के इस महाभियान से हम भी जुड़ें। संघ को अखबार, चैनल या नेताओं के द्वारा समझने के बजाये सीधा जुड़ कर स्वयम अनुभव करें । संघ कार्य की गहराई, पवित्रता और राष्ट्र को विश्व गुरु बनाने का जनून और इतना ही नहीं तो इसके लिए निश्चित कार्ययोजना को समीप हो कर देखें ।
  

भारत को संघरूपी कल्पवृक्ष देने वाले अदभुत मनीषी थे डॉ. हेडगेवार -- श्री विजय नड्ढा जी

तन समर्पित मन समर्पित और यह जीवन समर्पित चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं- इस श्रेष्ठ और उच्च भाव से प्रेरित था संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार का जीवन। आध्यात्म और देशभक्ति का सुमेल बैठाने वाले डॉ. हेडगेवार ने स्वामी विवेकानन्द की इच्छा - 'थोड़े समय के लिए सब देवी देवताओं को एक और रख कर भारतमाता को अपना आराध्य बनाने के आह्वान' को साकार कर दिया। डॉ. हेडगेवार का बहुआयामी व्यक्तित्व हिमालय से ऊँचा और समुद्र से गहरा है। उनके 51 वर्ष के छोटे लेकिन अत्यंत सक्रिय जीवन वृत्त को एक लेख में समेटना समुद्र को घड़े में समाने की असफल चेष्टा जैसा ही है। इस लेख में उनके प्रेरक जीवन की मात्र एक झलक ही मिल जाये तो काफी है। 
ऋषि परम्परा के वाहक डॉ. हेडगेवार-  
    
समाजरुपी कबूतर को बचाने के लिए राजा शिवि की तरह कबूतर के बजन के समान अपना मांस देने तथा वृत्रासुर के आतंक से मुक्त कराने के लिए देवताओं के आग्रह पर बज्रास्त्र बनाने के लिए अपनी हड्डियां देने वाले महर्षि दधीचि की परम्परा के आधुनिक प्रतीक थे डॉ. हेडगेवार। जब देश को स्वंतत्र कराने के लिए युवकों में अंग्रेज की गोली खाने या फांसी चढ़ जाने का वातावरण गर्म था, क्रन्तिकारी अपनी जवानी को राष्ट्रदेव के चरणों में चढ़ाने को ललायत थे, अधिकांश कांग्रेस के नेता जेल जाने को ही देश भक्ति मानते थे। ऐसे समय में इस महापुरुष ने सिंहनाद किया कि अवश्यकता पड़ने पर देश के लिए मर मिटना, जेल जाना जरूरी है लेकिन उससे भी बड़ी देशसेवा देश के लिए जीना और जेल से बाहर रह कर अंग्रेज के विरुद्ध समाज को लामबंद करना है। उन्होंने अपनी सोच और व्यवहार में राष्ट्र को वरीयता देने वाले संस्कारित युवकों को तैयार कर उन्हें संगठन की माला में पिरो देने का असंभव कार्य करके दिखा दिया। असंभव इसलिए क्योंकि उस समय जब डॉ. हेडगेवार ने हिन्दू संगठन को अपना जीवन कार्य बनाया उस समय सामान्य धारणा थी कि चार हिन्दू कभी एक साथ, एक दिशा में नहीं चल सकते जब तक पांचवां उनके कन्धे पर न हो। इसी समय 1909 में बंगाल के यू. एन. मुखर्जी ने हिन्दू जाति के लिए डाईंग रेस का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। ऐसे विपरीत समय में जब डॉ. हेडगेवार ने हिन्दू संगठन की घोषणा की तो सब हैरान रह गए। डॉ. हेडगेवार की कार्यशैली और स्वयं को प्रचार- प्रसिद्धि से दूर रखने की प्रकृति का ही परिणाम है कि आज संघ की चर्चा सर्वदूर है लेकिन संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार को बहुत कम लोग जानते हैं। आने वाली पीढियां डॉ. हेडगेवार को एक कुशल संगठक, मौलिक चिंतक और शून्य से सृष्टि रचने वाले अद्भुत जीवट के धनी तथा भारत को हिन्दू संगठनरूपी कल्पवृक्ष की भेंट देने वाले मनीषी के रूप में जानेंगीं। संघ को समझने के लिए डॉ. हेडगेवार के जीवन को समझना अत्यंत आवशयक है। आईये! उस महा पुरुष के जीवन और दर्शन को समझने का प्रयास करें।
जन्मजात देशभक्त थे डॉ. हेडगेवार- 
अप्रैल एक 1889, हिन्दू नववर्ष अर्थात वर्ष प्रतिपदा के ऐतिहासिक दिन पर एक अत्यंत सामान्य कर्मकांडी ब्राह्मण पिता बलिराम हेडगेवार तथा माता रेवती की कोख से बालक केशव ने जन्म लिया। तीन भाई तथा चार बहनों का बड़ा परिवार भयंकर गरीबी से जूझ रहा था। आय का मात्र माध्यम पुरोहित्य कर्म था। सरस्वती की आराधना के सिवाए और कोई भी कार्य घर में नहीं होता था। बालक केशव बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि, स्वाभिमानी तथा जिद्दी था। जिस उम्र में बच्चे मिठाई के लड़ते है, जिद्द करते हैं उसी उम्र में बालक केशव ने महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के 60 साल पूरे होने पर 22 जून 1897 को स्कूल में बांटी जाने वाले लड्डू को कूड़े के ढेर में फैंक दिया। एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण पर आतिशबाजी देखने नहीं गए। सनकी अंग्रेज मजिस्ट्रेट को सलाम करने से यह कह कर मना कर दिया कि इज्जत मांगी नहीं अर्जित की जाती है।' Respect is commanded not demanded.
स्वंतन्त्रता सेनानी डॉ साहिब-
बालक केशव ने दशवीं कक्षा में 1907 में नील सिटी हाई स्कूल में वन्देमातरम का जय घोष कर सबसे पहले अंग्रेज सत्ता को सार्बजनिक चुनोति दी। आगे मेडिकल की पढ़ाई के लिए कलकत्ता का च्ययन भी विचारित था। कलकत्ता उन दिनों क्रांतिकारियों की काशी माना जाता था। कलकत्ता के ये साल आज के युवा के लिए अत्यंत प्रेरक हैं। केशव का आर्थिक कठिनाई के चलते दोस्तों के साथ कमरे में रहना, रात को सो जाने पर उनकी किताबें पढ़ना, क्रांतिकारियों के कार्य को आगे बढ़ाना तथा कालेज एवं समाज सेवा की अनेक गतिविधियों में पूरी सक्रियता लेकिन इससे भी बड़ी बात ये सब करते हुए पढ़ाई में आगे रहना बड़ी विशेषता दिखती है। केशव के ऊँचे ठहाकों में गरीबी का दर्द बेचारा नजरें छुपाता फिरता था। केशव की जोश में होश बनाये रखना, साहस व् सूझबूझ तथा पैनी दृष्टि साथियों को हैरान कर देती थी। अंग्रेज पुलिस के सीआईडी के लोगों की सीआईडी केशव करता था। मुहल्ले में विद्यार्थियों के कमरे पर पड़ने वाले पत्थरों को इन्होंने अपनी विशेष शैली से रोक लिया। इन्होंने मुहल्ले वालों को कहा कि अगर हमारे कमरे में पत्थर आने नहीं रुके तो सड़क पर जो भी व्यक्ति मिलेगा मैं उसकी पिटाई करूँगा। आश्चर्य कि अगले दिन से पत्थर पड़ने बन्द हो गए। कालेज के अंतिम दिनों में प्रिंसिपल के ब्रह्म देश में आकर्षक नोकरी के प्रस्ताव को यह कह कर विनम्रतापूर्वक ठुकरा देना कि जब तक मेरा देश गुलाम है मैं अपने लिए कोई भी काम नहीं करूँगा वास्तव में उनकी देश के प्रति श्रद्धा और समर्पण की भावना को दर्शाता है। देश की आजादी के प्रत्येक कार्य में डॉ. साहिब आगे रहते थे। वे कांग्रेस और क्रांतिकारियों में प्रथम विश्व युद्ध के समय 1857 एक बार फिर दोहराने के लिए इन्होंने पूरे देश में शस्त्रों का जाल बिछा दिया। लेकिन इनकी पारखी नजरों ने कमजोर कड़ियों को तुरन्त भांप लिया और बिना देर किए निष्काम कर्मयोगी की तरह उसी उत्साह, परिश्रम और सावधानी से किसी को कानों कान खबर लगे बगैर सब कुछ समेट भी लिया। यद्यपि डॉ साहिब तिलक के अनुयायी होने के कारण गर्म दलीय थे तो भी कांग्रेस तथा क्रांतिकारियों में डॉ. साहिब समान रूप से सम्मान प्राप्त थे। कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति से पूरी तरह असहमत होते हुए भी कांग्रेस के आह्वान पर असहयोग आंदोलन और जंगल सत्याग्रह में दो बार जेल यात्रा कर चुके थे। डॉ. साहिब 1920 में लोकमान्य तिलक के देहांत से उत्प्न रिक्तता की पूर्ति के लिए कांग्रेस का नेतृत्व करने के लिए दुनिया से विरक्ति ले चुके महृषि अरविन्द को मनाने पांडिचेरी गए। 
चिंतक हेडगेवार-
डॉ केशव अपनी डाक्टरी की पढ़ाई पूरी कर 1914 में नागपुर आ गए। नागपुर आते ही समाज जागरण के अनेक कार्यों में डट गए। नोकरी, व्यवसाय और शादी के सभी प्रस्तावों को स्पष्टरूप से नकार दिया। दिन रात एक ही धुन अर्थात देश की आजादी। सब कुछ करते हुए समाज की नब्ज टटोलने का भी प्रयास करते रहे। महान संस्कृति, इतिहास और महापुरुषों की अखण्ड श्रृंखला वाला यह देश आखिर बार बार गुलाम क्यों हो जाता है? गहन अध्ययन, चिंतन और प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर समाज संगठन का अभाव, सर्व सामान्य जन में देशभक्ति की कमी इस सारी दुरावस्था के लिए बड़े कारण ध्यान में आए। और उस समय के बड़े नेताओं महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष वीर सावरकर आदि सबसे चर्चा कर अपना सारा जीवन समाज के संगठन के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया।
साहसी डॉ. हेडगेवार-
देशभक्ति के साथ निडरता इनके रक्त में ही समायी थी। खतरों से खेलने में तो इन्हें जैसे आनन्द ही आता हो। एक बार डॉ. साहिब गाड़ी में कहीं जा रहे थे। गाड़ी में पैर तक रखने की जगह नहीं थी। एक डिब्बा जो अंग्रेजों के लिए आरक्षित था एकदम खाली था। डॉ. साहिब से यह अन्याय शन नहीं हुआ। उन्होंने जैसे कैसे अंदर जा कर उसके दरबाजे खोल कर जनता को ऊंचीं आवाज में अंदर आने को कहा। देखते ही देखते सारा डिब्बा भर गया। अंग्रेज निरीक्षक गुस्से से उबल पड़ा और जोर से लोगों को बाहर जाने के लिए कहा। उसने बाहर न जाने पर डंडे से पीटने की धमकी दी। लोग घबरा कर बाहर जाने लगे तो डॉ. साहिब ने और भी ऊँची आवाज में कहा कि अगर कोई भी बाहर गया तो उसे मैं पिटूँगा। सब शांत हो कर बैठ गए। डिब्बा खाली करने में असफल रहा अंग्रेज इंस्पेक्टर पैर पटकता हुआ चला गया। इसी प्रकार कालेज के दिनों में इसी साहस व् सूझबूझ से मुहल्ले के शरारती लोगों द्वारा इनके कमरे में फैंके जाने वाले पत्थर रुकवाये थे।  
संगठक हेडगेवार-
डॉ. साहिब की सङ्गठन कुशलता अदभुत थी। ये स्वयं 'क्रिया सिद्धि सत्त्वे भवति महतां नो उपकरणे' अर्थात महान लोग साधनों के बिना केवल अपने सत्व के बल पर लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं की साक्षात् मूर्ति थे। खुले मैदान में कुछ बच्चों व्  युवकों को खेल, गीत आदि साधारण से कार्यक्रमों के द्वारा विश्व का सबसे बड़ा सन्गठन खड़ा कर लेना किसी चमत्कार से कम नहीं है। और सन्गठन भी ऐसा जहां व्यक्ति लेने के नहीं बल्कि देने के लिए स्वयं को प्रस्तुत करता है। अपनी जयजयकार नहीं बल्कि देश की जय जयकार की इच्छा रखता है। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने देश के लिए कल्पवृक्ष की तरह बन गया है। देशप्रेमियों की उम्मीदों तथा देशविरोधियों के लिए भय का केंद्र है यह संगठन। आने वाली पीढियां डॉ. हेडगेवार को कुशल सन्गठन करता के रूप में जानेंगी।

युवा आदर्श शहीद भगत सिंह -- श्री विजय नड्ढा जी

हजारों साल कुदरत अपनी बेनूरी पर रोती है।
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।। 
यह कहावत दुनिया के बाकी देशों के लिए ठीक बैठती होगी। लेकिन हमारी प्रिय भारत भूमि को यह वरदान प्राप्त है कि समय- समय पर एक से बढ़ कर एक महापुरुषों ने यहाँ जन्म लिया। यही कारण हैं कि जितनी दुनिया के देशों की कुल आयु नहीं है उससे कहीं अधिक कालखंड हमारा विदेशी हमलावरों से दो-दो हाथ करने का कालखंड है। लगभग एक हजार साल तक इस्लामिक हमलावरों से कड़े संघर्ष के बाद हमारे जुझारू पुर्बजों ने देश को मुक्त कराया ही था, अभी ठीक से साँस भी नहीं ले पाए थे कि दुनिया का सबसे शक्तिशाली, धूर्त अंग्रेज आ टपका। थोड़ी देर भले ही हमे अंग्रेज को समझने में लग गयी लेकिन हमने फिर से नये जोश के साथ जिसके राज्य में सूर्य अस्त नहीं होता था उस अंहकारी और शक्तिशाली ब्रिटिश सत्ता को भी घुटने टेकने को बिवश कर दिया। भारत का स्वंतत्रता संग्राम अद्भुत है। हमारे एक-एक वीर सपूत की संघर्ष गाथा रोंगटे खड़े कर देने वाली है। शहीद भगत सिंह राम प्रसाद विस्मिल, लाला हरदयाल, अरविन्द घोष व्  वीर सावरकर की परम्परा में थे जो केवल बंदूक की भाषा के लिए ही बल्कि अपने गम्भीर चिन्तन व् लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। आईये! अपने साहस, शौर्य और सूझबूुझ के चलते सम्पूर्ण ब्रिटिश सम्राज्य को हिला देने वाले शहीद भगत सिंह के जीवन के कुछ प्रमुख प्रेरक प्रसंग उनके जन्मदिवस पर याद करने का प्रयास करें।
देशभक्ति और सांस्कृतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि- लायलपुर जिले (पाकिस्तान)  में चक बंगा नाम के गाँव में सरदार किशन सिंह व् विद्यावती के घर सितम्बर 28, 1907 को भगत सिंह का जन्म हुआ। ये परिवार में तीसरे पुत्र थे। उनके जन्म के समय ही पिता किशन सिंह और चाचा अजित सिंह जेल से रिहा किये गये थे। जन्म के साथ ही अपने परिवार के लिए खुशी लाने के कारण उन्हें भागों वाला भी कहा जाता था। सम्पूर्ण परिवार ही पूरी तरह देशभक्ति के रंग में रंगा था। चाचा स्वर्ण जीत सिंह को अंग्रेजों के विरुद्ध जलूस निकालने के कारण डेढ़ साल की कैद हुई थी। जेल में ही उन्हें तपेदिक रोग हो जाने से उनकी मृत्यु हो गयी।  इनके दादा अर्जुन सिंह पक्के आर्य समाजी थे। परिवार पर आर्य समाज के प्रभाव के कारण घर में हवन आदि आम होते रहते थे। यहाँ क्रन्तिकारी यशपाल का संस्मरण प्रासंगिक है- सरदार किशन सिंह ने बीमे की एजेंसी ले रखी थी। उसके दफ्तर में अक्सर युवक आ कर बैठा करते थे। एक दिन यशपाल मेज पर बैठ कर कुछ लिख रहे थे। मेज के नीचे टीन की कोई वस्तु थी। अनजाने में उनके पैर उससे टकरा रहे थे। तभी एक बजुर्ग वहां आए और कुर्सी पर बैठ गये। यशपाल उनके आने से बेखबर, लिख़ने में व्यस्त टीन की वस्तु से पैर टकराये जा रहे थे।   सहसा गालिओं की जोरदार बरसात से यशपाल का ध्यान गलती की ओर गया। वास्तव मेज के नीचे टीन की वस्तु हवन कुंड था।
संस्कृत से प्यार-
भगत सिंह की ख्याति एक अच्छे विद्यार्थी की थी। डी ए वी स्कुल लाहौर में पढ़ते समय अपने परीक्षा परिणामों के सम्बद्ध में दादा जी को पत्र लिखा। ॐ से प्रारम्भ करके वो लिखते हैं कि संस्कृत में मेरे 150 से 110 अंक आये हैं। अंग्रेजी में 150 में से 68 अंक आए हैं"। 
स्वाधीनता रक्त बहाए बिना नहीं मिलेगी-
जलियांवाला बाग नरसंहार से क्षुब्ध किशोर भगत सिंह ने अंग्रेजों को भारत से उठा बहार फैंकने का संकल्प ले लिया था। गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन में सारा देश उदेलित हो रहा था। भगत सिंह ने आन्दोलन में भाग लेने के लिए 9 वीं कक्षा में स्कूल छोड़ दिया। वे जलूस निकालते और विदेशी वस्तुओं की होली जलाते। अभी वो कुछ अधिक कर पाते कि चौरा-चोरी घटना के कारण गाँधी जी ने आन्दोलन वापिस ले लिया। भगत सिंह के किशोर मन में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई। उनको लगा कि गाँधी जी के लिए स्वाधीनता से ज्यादा महत्व अहिंसा का है। कुछ सिपाही उतेजित जनता के हाथों मर गये तो क्या भारत की आजादी का आन्दोलन बंद कर देना चाहिए? इतने विराट देश की मुक्ति के लिए क्या रक्तपात नहीं होगा? भगत सिंह के मन में देश की आजादी के लिए किसी भी कीमत पर चाहे वह अहिंसा ही क्यूँ न हो अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का संकल्प और दृढ हो गया। 
क्रन्तिकारी-कठोर जीवन के व्रती-
जिनके कारनामों से अंग्रेज सरकार भी कांपती  थी, उनके पास खाने को रोटी तक नहीं होती थी। क्रन्तिकारी भगवान दास महौर ने लिखा है- सवेरे आजाद ने खाने के लिए कुछ रोटियां और गुड मंगवाया। आजाद केवल गुड और रोटियां खाएं यह बात भगत सिंह को चुभ रही थी। अतएव उन्होंने गुड में से एक डली उठा ली और हमें भी एक एक डली उठाने का इशारा किया। आजाद ने कहा - देखो! परेशान मत करो और भी बहुत काम करने हैं। मैं जो कुछ खाता हूँ जैसे खाता हूँ मुझे खाने दो। भगत सिंह नहीं माने। आजाद ने झुंझला कर सारा गुड फैंक दिया। साथियों ने मुश्किल से मनाया। आजाद फिर से खाने बैठ गये। भगत सिंह ने मुस्कराते हुए कहा कि अगर जिद ही है तो गुड धो तो लो जनाब! गुड धोया गया और आजाद सबके साथ रोटियां खाने बैठ गये।
साहिब, मेम और नौकर-
अंग्रेज अफसर सांडर्स को मार कर भागना कोई आसन काम नहीं था। भगत सिंह को लाहौर से निकालने के लिए एक अभिनव योजना बनाई गयी। भगत सिंह सिख थे। अंग्रेज पुलिस रेलवे स्टेसन पर सिख युवक की तलाश में थी। सब तरफ कड़ा पहरा था। इतने में हैट लगाये अंग्रेज अफसर, कंधे पर छोटा बालक और एक सुंदर मेम आए। उनके पीछे बिस्तर उठाये एक नौकर भी था। वे प्रथम श्रेणी के रिजर्व सीट से कलकत्ता जा रहे थे। कौन थे ये साहिब? साहिब थे अपने भगत सिंह, नौकर राजगुरु और मेम दुर्गा भाभी! सारी सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देकर ये सुरक्षित कलकत्ता पहुँच गये। अपने को चतुर समझने वाली ब्रिटिश सत्ता हाथ मलते रह गयी। 
बम कैसे बनाया जाता है?
भगत सिंह अदालत में सजग और चौकन्ने थे। सरकार ने सरकारी गवाहों को क्रांतिकारियों का रह्श्य जान कर उन्हें अराजक तत्व सिद्ध करने के लिए तैयार किया था। भगत सिंह और उनके साथियों ने इस प्रकार जिरह की कि जनता उनका असली स्वरूप जान सके। इसके साथ ही नये क्रांतिकारियों को तैयार करना भी उनका लक्ष्य रहता था। सरकारी गवाह बने फणीन्द्र नाथ घोष गवाही देंने आए तो क्रन्तिकारी शिव वर्मा ने पूछा कि अगर तुम सच में हमारे साथ मिल कर बम बनाते थे तो बताओ बम कैसे बनाया जाता था? इस प्रकार उन्हें बिबश कर दिया कि बम बनाने की पूरी बिधि बताएं। यह सारी रिपोर्ट अख़बार में छपी और सारा देश जन गया कि बम कैसे बनाया जाता है। 
अदालत में भी मस्ती
अदालत में दोपहर के खाने के समय क्रांतिकारियों से मिलने की अनुमति थी। श्रीमती सुभद्रा जोशी अपने संस्मरणों में लिखती है- उस समय खाने पीने का सामान देने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था परन्तु नियम था कि सारा सामान वहीँ खाना होता था। मैं प्रतिदिन एक दो चीजें ले जाती थी जो जेल में नहीं मिलती थी और जिन्हें सरदार भगत सिंह और उनके साथी बहुत पसंद करते थे। दहीं-बड़े सब बहुत पसंद करते थे। भगत सिंह केक बहुत चाव से खाते थे। एकदिन उन्होंने मुझे केक खिलाने की बहुत कोशिश की लेकिन उसमे अंडा होने के कारण मैं नहीं खा सकी। दोपहर के खाने का यह डेढ़ दो घंटे का समय हंसी और दिल्लगी में बीत जाता था। मृत्यु जिनके सर पर मंडरा रही हो उन नो जवानों की जिन्दा दिली देखते ही बनती थी। 
बेबे तू रोना नही-
मार्च 3 1931 को भगत सिंह अंतिम बार अपने परिवार से मिले। माता-पिता, दादा जी, चाची जी और भाई सभी तो थे सामने। पर सबसे आकुल व् अधीर थे सदा अर्जुन सिंह। उन्होंने ही तो इस कुल में क्रांति की ज्योति जलाई थी। वे भगत सिंह के पास गये कुछ कहना चाहा लेकिन कह न सके। लेकिन भगत सिंह एकदम सामान्य हो कर हंस हंस कर सबसे बातें कर रहे थे। अपनी माता जी से बोले- बेबे जी, दादा जी अब ज्यादा दिन जियेंगे नहीं। आप इनके पास ही रहना। यह भी कहा कि लाश लेने आप मत आना। कुलवीर को भेज देना। कहीं आप रो पड़ीं तो लोग कहेंगे की भगत सिंह की माँ रो रही है। 
हम तो सफर करते हैं-
भगत सिंह ने अंतिम बार अपनी कोठरी की ओर निहारा। तभी आ गये दोनो जीवन साथी राजगुरु और सुखदेव। तीनों की दृष्टि मिली,तीनों गले मिले। भगत सिंह ने गाना शुरू किया - दिल से न निकलेगी वतन की उल्फत, मेरी मिटटी से खुशबुए वतन आयेगी। फांसी तलघर के समीप  गोरा डिप्टी कमिश्नर खड़ा था इन आजादी के दीवानों की दीवानगी देख कर परेशान था। भगत सिंह उससे बड़े स्नेह से अंग्रेजी में बोले- ' well Mr Magistrate you arw fortunate to see how Indian revolutionaries can embras death with pleasure for the sake of their suprem ideal.
भगत सिंह के जीवन के सैकड़ों प्रेरणादायक प्रसंग हैं जो आज के युवा को उद्येलित कर सकते हैं। आवश्यकता है इन भारत माता के वीर सपूतों का जीवन नई पीढ़ी के सामने लाया जाये। नशे और राग रंग में रंगी पंजाब की जवानी को अपने देशभक्त क्रांतिकारियों का जीवन दिशा दे सकता है। 

मां और बेटे के बीच कांग्रेस -- चन्द्रमोहन जी

सोनिया गांधी के नेतृत्व में 14 पार्टियों के 100 सांसदों ने संसद भवन से लेकर राष्ट्ररपति भवन तक एक किलोमीटर मार्च कर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को विवादास्पद भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिलाफ ज्ञापन सौंपा। पहली बार इस तरह 10 जनपथ की ऊंची दीवारों से बाहर आकर सोनिया गांधी ने सड़क पर प्रदर्शन किया है। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी तथा लाल कृष्ण आडवाणी सब ऐसा कर चुके हैं लेकिन सोनिया गांधी की ऐसी सक्रियता देश ने पहली बार देखी है। वह अदालत द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को समन दिए जाने के बाद भी कांग्रेस के नेताओं के साथ मनमोहन सिंह के घर तक मार्च कर चुकी हैं। इस बार उन्हें अधिक समर्थन मिला क्योंकि तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, जनता दल (यू) तथा इनैलो जैसी कांग्रेस विरोधी पार्टियों के सांसद भी उनके पीछे चल रहे थे। सोनिया ने भी 'सभी प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक तथा भविष्योन्मुखी ताकतों' की बात कर भाजपा तथा मोदी विरोध को सैद्धांतिक बनाने का प्रयास किया है। वह सीधे तौर पर नरेन्द्र मोदी का नाम लेकर निशाना साध रही हैं और बताना चाहती हैं कि वही नरेन्द्र मोदी का सामना कर सकती हैं तथा पार्टी का नियंत्रण उन्होंने फिर संभाल लिया है। इस मामले में केन्द्रीय सरकार तथा भाजपा की असफलता है। भूमि अधिग्रहण के मामले में न वह देश को साथ लेकर चलने में सफल रहे हैं, न ही वह विपक्ष को बांट सके हैं। सोनिया खुद को किसानों का शुभचिंतक बताने के लिए उन प्रदेशों का दौरा भी कर रही हैं जहां वर्षा के कारण फसल तबाह हुई है। यूपीए बनाने के समय भी उन्होंने यह योग्यता दिखाई थी जब वह पहली बार खुद चल कर रामबिलास पासवान के घर गई थीं और उन्हें शामिल किया था। सोनिया समझती हैं कि भाजपा बैकफुट पर है और 'आपÓ उलझी हुई है लेकिन जैसे कहा गया है कि राजनीति में एक सप्ताह बहुत लम्बा समय है। शुक्रवार को ही कोयला तथा खनिज बिल पारित कर सरकार ने पासा पलट दिया। सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस, अन्नाद्रमुक, बीजू जनता दल सब सरकार के साथ खड़े थे। इन प्रदेशों को अब राजस्व का अधिक हिस्सा मिलेगा इसलिए वह कांग्रेस का साथ छोड़ गए हैं। सोनिया गांधी का नेतृत्व का प्रयास बीच लटकता रह गया है। हां, भूमि अधिग्रहण बिल जरूर एक बारूदी सुरंग की तरह है। सरकार का चेहरा झुलस सकता है।
पर सोनिया गांधी की सबसे बड़ी असफलता उनके अपने घर में है। मामला उनके पुत्र राहुल से जुड़ा हुआ है जो अपनी सारी जिम्मेवारी को एक तरफ फेंक कर पांच सप्ताह से गायब हैं। शायद मानना है कि राजनीति सचमुच 'ज़हर' है। मुझे तो ऐसा भी प्रभाव मिलता है कि जैसे उन्हें राजनीति में दिलचस्पी नहीं और मां जबरदस्ती उन्हें उधर धकेल रही हैं। यह भी आभास मिलता है कि राजनीति उन्हें जो विशेषाधिकार देती है उसको तो वह संभालना चाहते हैं लेकिन मेहनत कर उसकी कीमत नहीं चुकाना चाहते। राजनीति में वह उस तरह सुखद नज़र नहीं आते जैसे उनकी माता नज़र आती हैं। जो काम उनके पुत्र को करना चाहिए था सोनिया खुद कर रही हैं। वह यह संदेश भी दे रही हैं कि पुत्र की राजनीतिक कायरता के बावजूद कांग्रेस के शिखर पर 'नो वकेंसी' है, जगह खाली नहीं। पार्टी के महत्वाकांक्षी नेता शांत हो जाएं। लगता है कि सोनिया गांधी को भी पुत्र में अधिक विश्वास नहीं इसलिए उसे पूरी जिम्मेवारी सौंपी नहीं जा रही। दिलचस्प है कि कांग्रेस पार्टी में भी कोई राहुल की अनुपस्थिति महसूस नहीं कर रहा।
वैसे तो कांग्रेस राबर्ट वाड्रा का भी बचाव कर चुकी है जो जरूरी नहीं था क्योंकि कांग्रेस खुद मानती है कि उनके कारनामे 'व्यक्तिगत' हैं पर अब कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी की कथित जासूसी को लेकर अपना लतीफा बना लिया है। अगर सरकार ने जासूसी करनी है तो राहुल के घर परफार्मा लेकर एएसआई को भेजने की जरूरत नहीं आजकल तो जासूसी करने के बड़े आधुनिक तरीके हैं। हमने बीजिंग में परवेज मुशर्रफ तथा रावलपिंडी में बैठे उनके जनरल के बीच टेलीफोन वार्ता टेप कर ली थी। यूपीए के समय इस बात को लेकर खलबली मच गई थी कि वित्तमंत्री के दफ्तर में 'बग' अर्थात् खुफिया यंत्र लगा है। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह नियमित तौर पर अपने मेहमानों को बातचीत के लिए भवन से बाहर बाग में ले जाते थे क्योंकि उन्हें आशंका थी कि उनके वार्तालाप सुने जाते हैं। और जिस प्रकार की जानकारी राहुल के बारे प्राप्त करने की कोशिश की गई वह तो 'खुफिया' कही ही नहीं जा सकती। उनकी आंखों का रंग, कद काठ, जूतों का साइज क्या है यह सामान्य जानकारी है। सरकार ने बताया कि 1957 से दिल्ली पुलिस ऐसी प्रक्रिया अपना रही है जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, प्रणब मुखर्जी, सोनिया गांधी समेत 526 महत्वपूर्ण लोगों के बारे जानकारी इकट्ठी की गई लेकिन क्योंकि राहुल के घर एएसआई पहुंचा इसलिए कांग्रेस भड़क गई और बात का बतंगड़ बना दिया। यह कैसी पार्टी है जिसे हर सही-गलत, महत्वपूर्ण-महत्वहीन मामले में एक परिवार का बचाव करना पड़ता है? कांग्रेस की यह बेचारगी है जो उसके पतन का कारण बनी है। उनकी त्रासदी यह भी है कि जिसे वह दुल्हा बनाना चाहते हैं वह ही घोड़ी पर चढऩे को तैयार नहीं।
----चन्द्रमोहन जी

(लेखक दैनिक वीर प्रताप, समाचार पत्र के संपादक है)

वो आइना खुद को भी कभी दिखाओ -- चन्द्रमोहन जी


जिस वक्त देश में यह जबरदस्त बहस चल रही थी कि निर्भया बलात्कार पर आधारित बीबीसी वृत्तचित्र 'इंडियाज़ डॉटर' दिखाई जाए या न दिखाई जाए, लुधियाना के एक होटल में काम करने वाली लड़की जो देर रात काम के बाद घर लौट रही थी, के साथ गैंगरेप हो गया। अपने साथ रेप के बाद उस लड़की ने जो कहा वह उल्लेखनीय है, 'मैंने चूड़ीदार कुर्ता डाला हुआ था। मेरा कोई ब्वाय फ्रैंड नहीं है। मेरा कसूर क्या था? कुछ लोग कहते हैं कि जीन्स डालने से रेप हो जाता है। कुछ महिला के चरित्र को जिम्मेवार ठहराते हैं। मैं किसे दोषी ठहराऊं?' अपराधी मुकेश सिंह, हिन्दू महासभा तथा कई और समाज के ठेकेदार भी मानते हैं कि महिला का आधुनिक पश्चिमी लिबास रेप को आमंत्रित करता है लेकिन लुधियाना की यह मासूम तो चूड़ीदार कुर्ता में थी फिर उससे बलात्कार क्यों हुआ? हमने नगालैंड के दीमापुर में अलग घटना देखी जहां रेप की घटना से आक्रोषित भीड़ ने केन्द्रीय जेल पर धावा बोल कर आरोपी को बाहर निकाल पीट-पीट कर मार डाला। नगालैंड में बलात्कार की दर सबसे कम है पर इस तरह भीड़ की हरकत अलग कहानी बताती है कि लोग धीमे कानून से तंग आकर कानून खुद हाथ में लेने लगे हैं लेकिन अगर ऐसा सब करने लग पड़े तो अराजक स्थिति पैदा हो जाएगी। फिर तो माओवादी भी कहेंगे कि उनकी हिंसा भी जायज़ है।
दुनिया भर में बलात्कार होते हैं लेकिन आजकल हमारी बदनामी अधिक है जिस कारण एक भारतीय पुरुष को जर्मनी में इंटरनशिप से इसलिए इन्कार कर दिया गया क्योंकि भारत में 'रेप समस्या' है। बाद में जरूर इस जर्मन महिला प्रोफैसर ने माफी मांग ली लेकिन क्या बलात्कार केवल भारतीय समाज तक ही सीमित है, जर्मनी में बलात्कार नहीं होते? ग्लासगो में चलती बस में बाकी यात्रियों के सामने लड़की से बलात्कार किया गया। लंदन में 9 स्कूली लड़कों ने एक लड़की से सामूहिक बलात्कार किया। कुछ लड़के तो 13 वर्ष के थे। दिल्ली में जिस तरह निर्भया के साथ बलात्कार के बाद उसे यातनाएं दी गईं उसी तरह दक्षिण अफ्रीका में सामूहिक बलात्कार के बाद एक महिला को सड़क पर फेंक दिया। उसकी आंतडिय़ां बाहर निकली हुई थीं। पश्चिम में तो चर्च के अंदर रेप की शिकायतें मिल रही हैं।
निर्भया रेप पर वृत्तचित्र बनाने वाली निर्माता लेसली उडविन का कहना है कि इस पर प्रतिबंध लगा कर भारत ने 'अंतरराष्ट्रीय आत्महत्या' कर ली है पर इस महिला ने यह नहीं बताया कि इसे जारी करते हुए उसने कानून और नियमों का उल्लंघन क्यों किया? ऐसी तथा स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फिल्में भारत की बुरी तस्वीर पेश करती हैं जो हकीकत से मेल नहीं खातीं। स्लमडॉग मिलेनियर में चुन चुन कर ऐसे दृश्य डाले गए थे जो केवल इस समाज की गंदी तस्वीर पेश करें। बराक ओबामा ने भी धार्मिक असहिष्णुता पर हमें लताड़ दिया जबकि अमेरिका से रोज़ाना नसली हिंसा तथा नफरत के समाचार मिल रहे हैं। जहां तक बलात्कार का सवाल है संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार जिन देशों में सबसे कम बलात्कार होते हैं भारत उनमें शामिल है। क्योंकि यहां जनसंख्या अधिक है और अंतरराष्ट्रीय दुष्प्रचार मिल रहा है इसलिए बदनामी अधिक हो रही है कि जैसे हर भारतीय मर्द भेडिय़ा है।
जिन देशों में बलात्कार सबसे अधिक होता है उनमें अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, जर्मनी, स्वीडन, दक्षिण अफ्रीका, बैल्जियम जैसे विकसित देश शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्रीय की रिपोर्ट के अनुसार यहां प्रति 1,00,000 जनसंख्या बलात्कार की दर 1.8 है जबकि आस्ट्रेलिया में यह 28.6, ब्रिटेन में 24.1, अमेरिका में 28.6, स्वीडन में 66.5, बैल्जियम में 26.3 तथा दक्षिण अफ्रीका में 114.9 है। फिर भारत बलात्कारी देश कैसे हो गया? ब्रिटेन में बलात्कार की दर हमसे 13 गुणा अधिक है। बीबीसी ने अपने घर में इतनी शोचनीय हालत के बारे वृत्तचित्र क्यों नहीं बनाया? बीबीसी तथा सीएनएन जैसे चैनल हैं जो पश्चिमी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हुए दूसरों को नीचा दिखाते रहते हैं। हमारे बारे पूर्वाग्रह पक्के किए जाते हैं। वह तो हमें एक गरीब, पिछड़ा, अनपढ़, अभद्र देश ही देखना चाहते हैं पर हमें अपने पुराने मालिकों से नसीहत नहीं चाहिए। हमें भी इन्हें शीशा दिखाना चाहिए कि दुष्कर्मी तथा विकृत लोग उनके समाज में भी हैं। सर जेम्स सैविल जिसका जिक्र मीनाक्षी लेखी ने भी एक लेख में किया है, बीबीसी में एक शो होस्ट करता था। उसकी मौत के बाद उसके खिलाफ यौन उत्पीडऩ की कई सौ शिकायतें बाहर आई हैं जिससे पुलिस का मानना है कि यह शख्स धारावाहिक यौन अपराधी था। बीबीसी ने अपने शो होस्ट के बारे अपनी खोजी पत्रकारिता के हुनर का इस्तेमाल क्यों नहीं किया? अब कहा जाता है कि वह अपने स्टाफ तथा परिचित, जिनकी उम्र 5 वर्ष से 75 वर्ष तक थी, पर यौन हमले करता रहा। इनमें लड़के और लड़कियां बराबर थे लेकिन अभी तक इसका 'सर' का खिताब वापिस नहीं लिया गया। बीबीसी से पूछना है कि अगर उसे बलात्कार की इतनी चिंता है तो वह 'सर' जेम्स सैविल पर 'इंडियाज़ डॉटर' की तरह 'ब्रिटेनज़ फादर' वृत्तचित्र क्यों नहीं बनाती? वहां दक्षिणी यार्कशायर में 1997-2013 के बीच 1400 बच्चों का यौन उत्पीडऩ हुआ था। वहां के पूर्व सांसद डैनिस मैक शेन ने स्वीकार किया है कि वह इस बात के अपराधी हैं कि इसे रोकने के लिए उन्होंने बहुत कम प्रयास किया।
अर्थात् कोई भी समाज नहीं है जो ऐसे भेडिय़ों से अछूता हो केवल हमारा दुष्प्रचार अधिक होता है जिसमें हमारे अंग्रेजी मीडिया का भी एक वर्ग शामिल है जिनके लिए पश्चिम की राय किसी धर्म ग्रंथ के आदेश से कम नहीं। हां, यहां कमजोरियां हैं। समाज का एक वर्ग आधुनिक, आजाद तथा आत्मनिर्भर महिला की अवधारणा को पचा नहीं पा रहा है। और अगर मुकेश सिंह का मामला लम्बित न होता तो वह यह बताने की स्थिति में न होता कि किस तरह उसने उस लड़की की हत्या की थी। 2013 में बलात्कार के मामलों में केवल 27 प्रतिशत को सजा मिली थी लेकिन सजा की दर कई पश्चिमी देशों में इससे भी कम है। अमेरिका में 100 में से केवल 3 को कैद की सजा मिलती है। हमारी सजा की दर ब्रिटेन से अधिक है लेकिन निश्चित तौर पर बहुत सुधार की गुंजाइश है क्योंकि यहां तो पीडि़त महिला थाने में जाने से घबराती है। एनडीटीवी ने लखनऊ की एक महिला से बात की है जिसके साथ बलात्कार तब हुआ था जब वह मात्र 13 वर्ष की थी। अब वह 23 वर्ष की है पर मुकदमा शुरू नहीं हुआ क्योंकि अपराधी की राजनीतिक पहुंच है। अगर इसी तरह बलात्कार के मामले लटकाए जाते रहे तो दीमापुर जैसी और घटनाएं हम रोक नहीं सकेंगे। बीबीसी की चिंता किए बिना हमें अपना सुधार करना है पर हमें बदनाम करने वाले पश्चिमी प्रचार तंत्रों को ज़रूर कहना चाहूंगा,
हर रोज़ मेरे रूबरू करते हो जिसे आप,
वो आइना खुद को भी कभी दिखाओ!

--चन्द्रमोहन जी
(लेखक दैनिक वीर प्रताप, समाचार पत्र के संपादक है)

सच्चाई से कोसों दूर है वरिष्ठ पुलिस अधिकारी रिबेरियो की बेचैनी-- श्री विजय नड्ढा जी

पंजाब के पूर्व पुलिस प्रमुख 86 वर्षीय श्री रॉबर्ट रिबरियो की खीज, घबराहट और निराशाभरे वक्तव्य की ओर देश का ध्यान जाना स्वाभाविक है। लेकिन उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत जी, प्रधानमन्त्री श्री मोदी और हिन्दुत्व को कठघरे में खड़ा करने का जो प्रयास किया है उससे उनकी अपनी छवि को धक्का जरूर लगा है। पंजाब में आतंकवाद के विरुद्ध लोहा लेकर देशवासियों की जो श्रद्धा और सम्मान रिबेरियो के प्रति है ऐसे बयानों से मिटटी होता जाएगा। लोगों के मन में प्रश्न आ रहा है कि क्या आतंकवाद के समय पुलिस का नेतृत्व कर  उन्होंने देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाया था या  कोई एहसान किया था? उन्हें याद होगा कि पंजाब में आतन्कवाद के विरुद्ध लोहा पुलिस अधिकारी रिबेरियो ने लिया था न कि ईसाई प्रचारक रिबेरियो ने। और देश की श्रद्धा भी पुलिस अधिकारी रिबेरियो के प्रति है ईसाई रिबेरियो के प्रति नहीं। भारत में सेना और पुलिस में जाति, धर्म नहीं बल्कि व्यक्ति की देशभक्ति और कर्मठता ही सोचने और व्यवहार करने का प्रमुख आधार होता है। आश्चर्य है कि पुलिस अधिकारी रिबेरियो के ऊपर इस उम्र में ईसाई रिबेरियो कैसे हावी हो गया?
काल्पनिक सवाल और आशंकाएं-
रॉबर्ट रिबेरियो द्वारा उठाए गए काल्पनिक सवालों और आशंकाओं से वे पुलिस अधिकारी से ज्यादा ईसाई मिशनरी अधिक लग रहे हैं। क्या इस पुलिस अधिकारी पर उम्र हावी हो रही है? बुढ़ापे में धार्मिक होना, अपने धर्म के प्रति ज्यादा  निष्ठावान होना अच्छी बात है लेकिन सच्चाई का दामन छोड़ देना तो ठीक नहीं। क्या ईसाई मिशनरी और अंतर्राष्ट्रीय शक्तियां उभरते भारत के विजय रथ को रोकने के लिए, दुनिया में सरकार और देश की छबि खराब करने के लिए इस पुलिस अधिकारी को प्रयोग करने में सफल हो गयी हैं? रिबेरियो का यह कहना कि मैं अब भारतीय नहीं रह गया हूँ कम से कम उन लोगों के लिए तो कदापि नहीं, जो हिन्दू राष्ट्र के पक्षधर  हैं...प्रश्न उठ रहा है कि रिबेरियो साहिब को अपने बारे अचानक यह आशंका क्यों हो रही है? क्या किसी ने रिबेरियो को कुछ कहा है? अगर ये महाशय देश में ईसाई मिशनरियों के विरुद्ध दिख रहे गुस्से को अपना व्यक्तिगत विरोध मान रहे हों तो इन्हें स्वामी विवेकानन्द ने ईसाई मिशनरियों के सम्बद्ध में जो कहा था, उसे याद करना ठीक होगा- हिन्द महासागर में जितना कीचड़ है अगर सारे भारतवासी मिलकर उस कीचड़ को ईसाईयों पर फैंकने लगें तो भी यह उस अन्याय जो ईसाईयों ने भारत के साथ किया है, का शतांश भी बदला नहीं होगा। जहां तक हिन्दू राष्ट्र की बात है तो रिबेरियो साहिब जरूर जानते होंगे कि भारत ही है जहां ईसाई और इस्लाम ही नहीं तो पारसी जैसे नगण्य समाज भी पूरा मान-सम्मान और सुविधाएँ प्राप्त कर रहे हैं, इतना ही नहीं तो बहुसंख्यक समाज से कहीं ज्यादा तो यह हिन्दू भाव के कारण ही है। नहीं तो पाक, बंग्लादेश और अरब देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति क्या है, सारी दुनिया जानती ही है। इसलिए किसी को हिन्दू राष्ट्र से एलर्जी का कोई कारण नहीं होना चाहिए। रिबेरियो साहिब, भारत के बड़े दिल का और क्या प्रमाण चाहते हैं कि ईसाई, मुसलमानों का अत्याचार भरा अतीत आदि सब कुछ भूल कर भारत फिर भी ईसाई और मुसलमानों को गले से लगा रहा है। फिर भी ईसाई और मुसलमान अगर भारत में खुश नहीं तो किसी ने ठीक ही कहा है-
हम बाबफा थे इसलिए गिर गए तुम्हारी निगाहों से
तुम्हे शायद किसी बेबफा की तलाश थी।।
बड़पन्न भारत का या ईसाई मुसलमानों का
रिबेरियो लिखते हैं कि पुलिस प्रमुख, सेना अध्यक्ष और वायुसेना प्रमुख आदि ईसाई रह चुके हैं। तब किसी ने उनकी निष्ठा को लेकर सवाल नहीं उठाये और अब....! महोदय, सवाल तो अब भी कोई नहीं उठा रहा है। ऐसे प्रश्न खड़े कर, सेना और पुलिस अधिकारीयों को धर्म के तराजू में खड़े कर सवालों को जन्म तो आप खुद दे रहे हैं। अगर आपकी नहर से देखें तो ईसाई या मुसलमानों के कड़वे अतीत के बाबजूद इतने बड़े पदों के लिए देश आप पर भरोसा करता है तो इसमें बड़पन्न किसका है? दुनिया में कोई देश बता दो जहां अल्पसंख्यकों को सर्वोच्च पदों पर बिना किसी भेदभाव के बैठाया जाता हो। इतना सब होने पर भी भारत के अहसानमन्द होने के बजाए भारत की मंशा पर सवाल उठाना कौन सी मानसिकता का सूचक है
ईसाई मिशनरियों की मासूमियत के क्या कहनेरिबेरियो कहते हैं कि ईसाई समाज बहुत ही शांतिप्रिय और छोटा समाज है। पुलिस अधिकारी रह चुके रिबेरियो अगर यह कहते हैं तो जरूर दाल में बहुत कुछ काला लगता है। इनको अगर इनकी भाषा में ही समझाने की कोशिश करें तो- न्यायमूर्ति वेणुगोपाल आयोग अपनी रिपोर्ट में  लिखते हैं- 1982 में तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले में हुए भीषण दंगों के लिए ईसाई पादरियों द्वारा किया जा रहा धर्मान्तरण ही मुख्य कारण है। आयोग ने सुझाव दिया कि मतांतरण को प्रतिबन्धित करने के लिए शीघ्र केंद्रीय कानून बनाया जाए। नागालैंड के राज्यपाल ओ पी शर्मा (4 फरबरी 1994)  Nationalist Socialist Council of Nagaland को world council के 17 चर्चों से धन मिलता है। रिबेरियो साहिब आपने नियोगी कमीशन की केंद्र सरकार को दी सिफारिशें जरूर पढ़ी होंगी। नहीं तो ईसाई मिशनरियों के चेहरे से सेवा और मासूमियत का नकाब उतारने के लिए जरूर पढ़ लें। ईसाई और इस्लाम की शक्तियों को लेकर संघ प्रमुख गोलवलकर, सुदर्शन या भागवत न सही, महात्मा गांधी, वीर सावरकर, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानंद जैसे महापुरुषों ने देश को किन शब्दों में सावधान किया है जरूर याद करना चाहिए। 
आतंकवाद के पीछे चर्च?
पंजाब और पर्वोत्तर भारत में आतँकवाद के पीछे भारत और दुनिया के चर्च सक्रिय रहे हैं और अभी भी हैं, यह पुलिस अधिकारी के रूप में रिबेरियो से ज्यादा कौन जनता है? क्या रिबेरियो साहिब नहीं जानते हैं कि ईसाईयत के प्रचार के नाम पर इस समय भारत में प्रमुख विदेश संस्थाएं सक्रिय हैं? अरबों रूपये विदेशों से इसी काम के लिए आते हैं? अगर नाम ही गिनाने हों तो - बर्ल्ड विजन, वर्ल्ड रीच, यूनिसेफ, केथोलक बिशप कान्फ्रेन्स ऑफ़ इंडिया, इंडिया बाईबल लिटरेचर, हेल्पेज इंडिया क्राई,तथा समाधान आदि आदि। जहां तक इनके भोलेपन का सवाल है तो फ़िल्मी गीत की पंक्तियाँ याद आती हैं -
भोलापन तेरा खा गया मुझको.... केवल इतिहास का एक उदाहरण ही काफी है-1541में जेवियर नाम के ईसाई विजेता ने लाखों हिंदुओं को बलात् ईसाई बनाया। हिन्दू मन्दिरों को तोड़ कर चर्च बनाए गए। हिन्दू विधि से विवाह, यगोपवीत संस्कार अवैध घोषित कर दिए। सिर पर चोटी, घर के बाहर तुलसी का पौधा पर भारी दण्ड था। इसी समय ईसाई अधिकारियों को हिन्दू महिलाओं से बलात्कार करने का अधिकार प्राप्त था। जिन हिन्दू महिलाओं ने विरोध किया, उन्हें पकड़ कर जेलों में डाल कर अपनी काम वासना पूरी कर हेरेटिक्स अर्थात ईसाई मत के प्रति अविश्वासी घोषित कर जिन्दा जला दिया। (दा गोआ- इन्विजिशन - प्रयोलकर) क्या ये केवल अतीत की बातें हैं? काश! ये सच होता? आज भी देश में ईसाई मिशनरी भोले भाले गरीब हिन्दुओं का किस चालाकी से धर्मान्तरण कर रहे हैं, सारा पूर्वोत्तर ही नहीं तो देश के अनेक राज्यों सहित अब तो पंजाब भी चीख चीख कर अपनी बेदना कहता सुना जा सकता है। भोले-भाले मासूम स्कूली बच्चों के दिल में ईसा की महानता बैठाने के लिए भगवान राम, कृष्ण के नाम से बस को धक्का लगवाना और न चलने पर ईसा का नाम लेकर बस चला देना, भगवान राम, कृष्ण की लोहे की मूर्ति को पानी में डूबने देना और ईसा की लकड़ी की मूर्ति को तेरा कर बच्चों के सामने सिद्ध कर देना कि ईसा ही उन्हें भवसागर में तैरा कर पर लगा सकते हैं। ऐसे और कितने ही चालाकी भरे कृत्य मिशनरी करते हैं कि स्वर्ग में बैठे ईसा भी शरमा रहे होंगे। रिबेरियो साहिब ठीक कहते हैं कि ईसाई लोगों ने शिक्षा, चिकित्सा में बहुत योगदान दिया है यह बात भारत भी स्वीकार करता है, इसके लिए इन्हें धन्यवाद भी देता है, लेकिन इन सेवा संस्थानों और कार्यों की आड़ में कितना धर्मान्तरण हुआ है जब इसका विचार करते हैं तो इन ईसा के दूतों की सज्जनता, भोलेपन और सेवाभाव का सारा नकाब उतर जाता है। क्या रिबेरियो साहिब एक सवाल का जबाब देश को देंगे? देश के उन्हीं हिस्सों में अलगावाद, आतँकवाद, देश के बिरुद्ध गाली-गोली की बात क्यों सुनाई देती हैं जहां ईसाई या मुसलमान अधिक संख्या में होते हैं? जम्मूकश्मीर से लेकर नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर, बंगाल आसम और अरुणाचल आदि राज्य इसका सीधा प्रमाण हैं।
संघ को कितना जानते हैं रिबेरियो?
अपनी धुन में रिबेरियो प्रधानमन्त्री श्री मोदी के साथ ही संघ और संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी लपेट गए। क्या रिबेरियो संघ को जानते हैं? संघ की देशभक्ति की दाद तो संघ के कट्टर विरोधी भी देते रहे हैं। संघ की देशभक्ति सेना या पुलिस से किसी भी अर्थ में कम नहीं है फर्क केवल इतना है की सेना और पुलिस में सेवा के बदले वेतन मिलता है जबकि संघ में घर फूँक तमाशा देखना होता है। लगता है संघ पर प्रश्न उठा कर उन्होंने अपनी अज्ञानता और खीज का ही परिचय दिया है। उन्होंने मदर टेरसा को लेकर मोहन भागवत के जिस वक्तव्य की बात की है क्या वे जानते हैं कि यह बात मोहान भागवत ने नहीं, बल्कि कार्यक्रम के अध्यक्ष ने कही थी। मोहन भागवत ने तो कहा कि मदर टेरसा क्या थी और उनके उद्देशय क्या थे हम नहीं जानते हम तो केवल अपना बता सकते हैं कि हम गरीबों की शुद्ध सेवा भाव से करते हैं। पुलिस अधिकारी रह चुके रिबेरियो ने भी तथ्यों की जाँच पड़ताल किए बगैर ही संघ के बिरुद्ध मोर्चा खोल दिया तो क्या कहा जा सकता है? हालाँकि मदर टेरसा को लेकर अब कोई भ्रम नहीं रहा है। स्वयं उन्होंने कई जगह अपने सारे सेवा कार्यों के पीछ का उद्देशय शुद्ध धर्म परिवर्तन बताया है। अगर सेवा ही उद्देशय था तो क्या ईसाई देशों में गरीबी, भेदभाव समाप्त हो चुका था जो वह भारत में आ डटी? हम मदर टेरसा की इज्जत करते हैं, जो उन्होंने सेवा कार्य किए उसके लिए हृदय से धन्यवाद भी करते हैं लेकिन इस सबके बाबजूद सच्चाई से पीछे भागना कहां तक ठीक है? रिबेरियो साहिब जरूर जानते होंगे कि अपने सेवा कार्यों और मासूमियत के बल पर ईसाईयत देशों के देश निगल गयी। मात्र 2000 सालों में 100 से ज्यादा देश ईसाई हो चुके हैं। क्या यह केवल ईसाईयत की महानता के कारण हुआ या धोखा, धक्का इसके पीछे का  मूल कारण है? अफ़्रीकी देश केन्या के राष्ट्रपति की बेदना सुनें- जब ईसाई मिशनरी इस देश में आए तो अफ्रीकियों के पास जमीन थी और मिशनरियों के पास बाईबल। उन्होंने हमें आँख बन्द करके प्रार्थना करना सिखाया जब हमने ऑंखें खोली तो देखा कि उनके पास जमीन है और हमारे पास बाईबल! संघ को ईसाईयत या इस्लाम से कोई समस्या नहीं है। देशवासी ईसा और मुहम्मद का सम्मान सब करते हैं। भारत में सबकी पूजा पद्धति, मत मतांतर का सम्मान करने की परम्परा है। गोआ में सबसे पहले आए ईसाई पादरियों और इस्लाम के अनुयायियों को चर्च और मस्जिदें हमने स्वयं बना कर दी हैं। लेकिन देश का युवा जानना चाह रहा है हमे हमारी इस उदारता का क्या सिला मिला? पंजाबी गीत की पंक्तियाँ यहां सटीक बैठती हैं-
अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का!
यार ने ही लूट लिया घर यार का!! 
संघ देश को सावधान और यह सुनिश्चित करने की कोशिश करता रहता है कि ईसाईयत और इस्लाम मजहब के नाते स्वीकार्य स्वीकार्य हैं लेकिन इनकी आड़ में देश विरोधी तत्वों या शक्तियों को पनपने न दें। संघ का कोई अपराध है तो बस इतना ही है। अगर अन्य देशवासियों के साथ-2 ईसाई व् इस्लाम के बन्धुओं से देशभक्ति की अपेक्षा करना अपराध है तो हमारा तो यही कहना है-
वो कौन हैं जिन्हें तौबा को मिल गयी फुर्सत।
हमें तो गुनाह करने को भी जिंदगी कम है।।
अब अपने आप को देशबाह्य शक्तियों से दूर रखना, देश की मिटटी से जुड़े रहना ये जिम्मेदारी ईसाई और इस्लाम नेतृत्व की भी है। किसी को पसन्द आए या नहीं लेकिन भविष्य के भारत में सम्मान और विश्वास प्राप्त करने के लिए यह पूर्व शर्त जरूर है।